आ अब लौट_चले

मन नही लगता यहाँ अब

बहुत बेचैनी है क्या करें

चल मेरे दिलदार मेरे मन

लौट के अपने धाम चले

 

ये दुनिया नही तेरे काबिल

या तू नही इसके काबिल

इस बात में ना ही उलझे

अपनी डगर का रुख करे

 

आसमान को छूना है तो

जमीन छोड़ना मत कभी

जड़ो को मजबूत करें जो

बस उसी का ध्यान धरे

 

बहुत देखा बहुत परखा

रास ना आया शहर हमे

बोरिया बिस्तर बांध अभी

आज ही अपने गाँव चले

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