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वैश्या की याचना

बोझिल हवा के बोझ से
दबी हुई शाम यों बोली
एक कहकंशा तुम भी लगा लो
मरो न हम को गोली

शरारत तो हर कोई करता है
पर खुल जाने से डरता है
अँधेरे का फायदा उठा कर
खेलता है हर कोई होली

सीने पर तुम वार करो
पेट में छुरा क्यों घोपते हो
सचाई की खातिर मरेगी
मेरी ये सारी टोली

रंग-बिरंगी,मद-मस्त
कलियाँ बड़ी ही प्यारी है
कुछ पुण्य चाहते हो तो आज
उठा लो तुम इन की डोली

पेट पर लात मार के मेरे
तुम को क्या मिलेगा
खेलो तुम भी मुझ से आज
अनेक रंगों की होली

गर हम ना होती
चुनता संसार तब कलियों को
कलियुग की शान बचाने को
हम ने लगवाई है बोली

एक कहकंशा तुम भी लगा लो
मरो ना हम को गोली .........

 
Comments to the Poem
Very nice and touching.....
(Posted By: DR. NILOY KAR - pune )
padhkar achchha lga,likhte rahein.
(Posted By: DR. VIKAS JAIN - bhopal )
प्रकृति का हर रंग आप पे बरसे
हर कोई आपसे होली खेलने को तरसे
रंग दे आपको सब मिलके इतना
की आप वो रंग उतारने को तरसे

(Posted By: DR,MUNISH SOOD - shimla )
very good sir...emotional meaningful and simply superb
(Posted By: DR. T. DIVAKAR RAO - delhi )
emotional
showing the love of doctor toward the part of society which has been neglected but they are who giving the safety to thers

(Posted By: DR. A.K.SINGH - ghazipur )
अनछुए
तरक को
प्रकाश
में
ला
ने
वाली

(Posted By: DR. KAMINI DHIMAN - kangra )
It is a very emotional poetry.i realy liked.
(Posted By: DR. NEERAJ TIWARI - bhopal )
kahakashan ka kya matlab dr. saab ?
(Posted By: DR. SHEKHAR S.R. - bhopal )
amazing poetry dr.mukesh..liked it lot
(Posted By: DR. SHAIKH MOHAMMED FAROOQUE - pune )
बहोत सुन्दर सर ....................
(Posted By: VAIDYA PARBAT PATEL - unjha )
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