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दुग्ध - पान

महिमा अब भगवान की ख़त्म हो रही है
क्यों मूर्ति इस दृश्य पर मूक सो रही है
नहीं नहीं - ये नहीं हो सकता
भगवान सो नहीं सकता
कलियुग का अभी आरम्भ ही है
सरंचनाओ का अभी प्रारम्भ ही है
अभी से आस्तिकता ख़त्म हो जाएगी
तो क्या पूरी सृष्टि नष्ट नहीं हो जायेगी

भगवान इसके लिए जरूर कुछ करेंगे
लोगो के मन में अपने प्रति श्रद्धा भरेगें
अस्तिको, धर्म-पंथियों के मनो को हिला रहे थे
कि - तभी एक दिन अचानक
पूरे विश्व की मूर्तियाँ दुग्ध-पान करने लगी
नास्तिकों की आत्माएँ डरने लगे
धर्म-गुरुओं ने कहकहे लगाये
जोर जोर से नगाड़े बजाये

पूरा का पूरा लोटा दूध का खाली होने लगा
कुली भी उसदिन बस दूध ही ढोने लगा
हर छोटे से बड़े ने भगवान को दूध पिलाया
मंदिर जाकर अष्टांग कर अपने को खूब हिलाया
जो बूढ़े चल नहीं पाते थे, जो मोटू हिल नहीं पाते थे
वो भी उठे, मंदिर को बढे
घंटा हिलाया, भगवान को दूध पिलाया
तब कहीं जा कर चैन पाया

मंदिर में श्रद्धालुओं की लाईन लग लायी
देखते ही देखते भीड़ बढ़ गयी
पुलिस बुलवानी पड़ी, भीड़ हटवानी पड़ी
बच्चे कुचले गए, १०-१५ मर गए
क्या फर्क पड़ा, बहुत लोगो ने पुण्य कमाया
जो शहीद हो गए उन्होंने सीधा मोक्ष को पाया
भगवान खुश थे की लोगो में श्रद्धा भर गयी
पर इससे वैज्ञानिको की टोली डर गयी

तिगडम लड़ाई तो बात समझ में यूँ आई
सारा चक्कर surface tension का है भाई
जिसने सारी दुनिया बुद्धू बनाई
capillary action की मार है
जो नास्तिकों की इतनी बड़ी हार है
इसीके कारण दूध पिया जा रहा है
असल में सारा दूध minute particles
के रूप में नीचे आ रहा है

कुछ लोगो के भेजे से बात टकराई
कुछ के टकरा कर वापस आई
कुछ के कानों तक पहुचं नहीं पायी
इस तरह भगवान ने अपने भक्तों को दर्शन दे दिए
उसका भी भला जिसने किये, उसका भी भला जिसने नहीं किये
विश्व हिन्दू परिषद् का काम है एक तरफ से आवाज आई
नहीं भाई चंद्रास्वामी का तंत्र है - एक ने दी दुहाई
अरे नहीं पंडितो का किया धरा है - एक औरत चिल्लाई

परन्तु सारे तथ्यों से यही नतीजा निकलता है
अंधे धर्म के आगे सबके माथा टिकता है
 
Comments to the Poem
I like the last line of the poem very much.Nice poem,Sir.
(Posted By: DR. SUDHIR BHUJBALE. - akola. )
बहुत अच्छा वर्णन कलिजुग का !
(Posted By: VAIDYA MURALIDHAR PRABHUDESAI - sawantwadi )
बहुत सुन्दर सर,,धन्यवाद.
(Posted By: DR. (MRS.)POOJA MISHRA - dhar )
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