नारी एक - रूप अनेक

कभी माँ बन के अपनीं
ममता बरसाती हो तुम
ख़ुद भूखी रहकर मुझे
रोटी खिलाती हो तुम
गीले में सोकर मुझे
सूखे में लिटाती हो तुम
मुझे आँचल में छुपा कर
पापा की डांट खाती हो तुम !!

कभी बहन बन कर
मुझ पर प्यार लुटाती हो तुम
झगड़ा भी करती हो
पर मान भी जाती हो तुम
जरुरत पड़ने पर मेरा
होमवर्क निपटाती हो तुम
शादी के बाद बहुत
याद आती हो तुम !!

कभी मित्र बन के साथ
निभाती हो तुम
मेरे प्रिय मित्रो में
गिनी जाती हो तुम
अपना दुःख भूल मुझे
ढांढस बंधाती हो तुम
हर कदम कदम पर
खड़ी नज़र आती तो तुम !!

प्रेमिका बन मेरे दिल को
गुदगुदाती हो तुम
नगमे वफ़ा के भी
सुनाती हो तुम
भूल जाता हूँ हर ग़म
तेरे पास आने पर
मेरे हर दर्द की दवा
बन जाती हो तुम !!

अपने माता पिता को छोड़
पत्नी बन आती हो तुम
मेरे मकान को घर
बनाती हो तुम
मेरे हर काम में हाथ
बंटाती हो तुम
खुद नींव का पत्थर बन
मुझे आगे बढाती हो तुम !!

बेटी बन मेरी बगिया
में आती हो तुम
मेरे घर आँगन को
महकाती हो तुम
आता हूँ जब घर
थक हार कर
पापा पापा कह कर
गोद में चढ़ जाती हो तुम !!

इस तरह हे नारी
कई रूपो में आती हो तुम
त्याग प्रेम और समर्पण की
मूरत समझी जाती हो तुम
पुरुष तुम बिन अधूरा है
उसको हर जगह पूर्ण
कर जाती हो तुम !!

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