अन्तकाल

शायद मेरा अस्तित्व,

खोने जा रहा है,
मुझे लग रहा है,मेरा अन्तकाल,
नज़दीक आ रहा है...........!

मन में कोई,
उमंग नहीं रह गई है,
सारी की सारी यादें,
आंसुओं में बह गई है......!

हवा का एक झोंका अब,
दिया भुझाने जा रहा है,
मुझे लग रहा.............!

आकाश के तारे,चाँद की चांदनी,
अब मन नहीं कुरेदती है,
पक्षियों की चहचाहाट,मेंद्कों की टाई-टाई,
अब दिल को नहीं भाती है,
जाने कहा गए वो दिन,
यही गीत याद आ रहा है,
मुझे लग रहा.............!

बुरे भले की पहचान,
अब नहीं की जाती है,
क्या करू किसको कहू,
आँखें रास्ता नहीं सुझाती है,
पता नहीं क्यों ये मन,
बहकाया जा रहा है,
मुझे लग रहा............!

साथ मेरा छोड़ गए,
जहाँ वाले सब लोग,
मर कर ही छूटेंगे,
अब मेरे ये रोग,
मेरा ही साया मुझसे,
अब छूटता जा रहा है,
मुझे लग रहा..............!!!

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