SAMALOCHAK

समालोचक हूँ समालोचनाएँ उठाये जा रहा हूँ 

अँधेरी गली है सामने
पर फिर भी किसी उम्मीद में रास्ता बनाये जा रहा हूँ

वीराने सफ़र में साथ नहीं है कोई
अपनी धुन में अकेला
यही गीत दोहराए जा रहा हूँ

सुनने वाले बहुत है
पर कोई सुनता नहीं है
इसलिए सभी को बहरा बताये जा रहा हूँ

किसी भी बात पर विवाद खड़ा कर देता हूँ
आता है जो जी में वो कर्म में भर देता हूँ
बात छोटी सी है पर कब से समझाए जा रहा हूँ

मुश्किलों का सफ़र अभी रुका नहीं है
मंजिल कहाँ है ये भी पता नहीं है
इसी मंजिल की तलाश में
जिन्दगी के वादे निभाए जा रहा हूँ

कहानी घडता हूँ कुछ बन कुछ जाती है
हालात के कारण अब नींद भी नहीं आती है
शायद अपने ही मन को बुझाये जा रहा हूँ

चेहरे पर धूल पड़ने से चेहरा बदल गया है
सफ़ेद रुमाल से उसको हटाये जा रहा हूँ
हटती ही नहीं है जालिम कसम खाए बैठी है
मैं भी हटाने की धुन में खता खाए जा रहा हूँ

कोई रास्ता है तो बताओ इस भंवर में फंसी कश्ती
को निकलने में मेरा हाथ बताओ
बार बार यही गीत दोहराए जा रहा हूँ

समालोचक हूँ समालोचनाएँ उठए जा रहा हूँ
संकरी गली है सामने
पर फिर भी किसी उम्मीद में रास्ता बनाये जा रहा हूँ

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