PREMIKA

I wrote this poem in 10th class & it is dedicated to Dr T. Divakar Rao's recently posted story - How to love anybody (anything) in just seven days.

सब से अच्छी लगती है
सब से प्यारी लगती है
राजकन्या सी वो मुझे
राजदुलारी लगती है
दिन भर भी मैं उसके
लिए प्रार्थना करता हूँ
यहाँ तक के दिलोजान
से उस पे मरता हूँ

इतना मुझे तडपाती है
टीचर से डंडे डलवाती है
कभी पड़ते वक्त आ जाती
तो मम्मी नाराज होती है
देख के पापा गुस्सा होते
जब वो मेरे साथ होती है
लगती तो बहुत प्यारी है
पर क्या करूँ बेचारी है

न घर वाले ,न बाहर वाले
उसको टिकने देते है
कहते है तुझे बर्बाद कर दे गी
इसलिए सब उस से चिढ़ते है
मेरी डांट का कारण है
मैं फिर भी उसे पसंद करता हूँ
क्यों की जन्म से
अब तक उसपर मरता हूँ

पढाई में आ जाती है तो
कुछ समझ में न आता है
सोचते वक्त आ जाती है
तो बेडागर्क हो जाता है
उसका साथ पा कर
भाग्य पर भी रोता हूँ
क्यों की सब जगह
उसी के कारण फेल होता हूँ

अब आखिर में उस का
suspense खोल रहा हूँ
क्या नाम है उस का
अब मैं बोल रहा हूँ
नींद नाम हैं उसका
मुझे हरदम उसी की प्यास है
मुझे अगले जन्म में भी यारो
बस उसी की आस है

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