मेरी चाह

This poem of mine is dedicated to Dr Sathya N. Dornala and Dr Kranthi R. Vardhan as they both have reciceved prestigious Award in Ayurveda By enlightened the vedic health science.

मै आकाश बनना चाहता हूँ - कमरा नहीं
मैं समुन्र्द बनना चाहता हूँ - घड़ा नहीं
मेरी महत्वाकांक्षाओ का कोई अंत नहीं है - वो अनंत है
मेरी इच्छा ,मेरा विश्वास
घटनाओं के चक्रव्यूह में होने पर भी ज्वलंत है

इस लिए मैं सब कुछ सुनना चाहता हूँ
सूत्रधार बन जीवन का साहित्य पिरोना चाहता हूँ
भावनात्मक धुन पर सभी की आंखे भिगोना चाहता हूँ

मैं चाहता हूँ - एक नई व्यवस्था
मैं चाहता हूँ - एक नया समाज
मैं चाहता हूँ - एक नया आँगन
जहाँ खिला हो प्यार का नन्हा पौधा
आसमान की और आँख लगाये
जैसे धरती की गोद से निकल
आसमान को चूमना चाहता हो

ये फासला जो सदियों से
चला आया है - धरती आसमान में
ख़तम कर देना चाहता हो
और साथ ही अपने अस्तित्व को
कायम रखते हुए बढ़ जाना चाहता हो
एक उज्जवल क्षितिज की और
जिस का कोई नहीं हो छोर

जो बढ़ता ही जाये
उमंगें लिए - तरंगे लिए
यही गीत गाते हुए
मंद मंद मुस्काते हुए
हम होंगे कामयाब
हम होंगे कामयाब .....एक दिन

In the end, I would like to congratulate both these stalwarts of Ayurveda, who are really doing a highly commendable job for the cause and promotion of ayurveda.

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